लीची की कहानी Lichi farm of Muzaffarpur Bihar


इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई 

हम न सोए रात थक कर सो गई 
-राही मासूम रज़ा

आखिरकार घूमते घूमते ये अहसास होने लगा कि बिहार राज्य का नाम शायद हमारे जैसे घुमक्कड़ों की वजह से पड़ी हो। हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है, मालूम नहीं। मुजफ्फरपुर से लगभग दस किलोमीटर और कच्ची पक्की रामदयालु चौक से मात्र 7 किलोमीटर दूर मुशहरी ब्लॉक के सामने 100 एकड़ का मीठा जंगल राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद का देश में एकमात्र लीची अनुसंधान केंद्र है। लीची चीन में जन्म लेकर मुजफ्फरपुर घूमते घूमते ही पहुंची एक घुम्मकड़ फ्रांसीसी के सौजन्य से। 1770 के दशक में। एक बार आ गई तो यहां की आबो हवा ने इसे सींच कर राजा बाबू की तरह सम्मान दिया। शाही लीची नाम में यह सम्मान झलकता है, वैसे ही जैसे भगवान श्री कृष्ण को माता यशोधरा के घर एक मां का अंतरंग प्रेम और शाही सम्मान मिला।। सोच सोच कर अटक जाता हूं की ये दुनिया ऐसे ही सिरफिरे घुमकड़ो ने बनाई है, दुनिया की खोज में निकले इन शूरवीरों ने अपने प्राणों की बलि तक दे दी। खैर, हम तो अपने बिहार की ही खोज में लगे हैं। बिहार अपना घर है। घर को जानने बिना बाहर की समझ नहीं हो सकती। पहली दीक्षा परिवार में पाई जाती है। 
    बाग के चहारदीवारी के अंदर प्रवेश के साथ ही दिल बाग बाग होना मुहावरे का अर्थ पता चल गया। सौ एकड़ में विस्तार। लीची ही लीची। कहां से शुरू की जाय। ये सवाल बड़ा था। कुल 4 हजार पेड़ हैं लीची के यहां जो विभिन्न सेक्शन में बंटे हुए हैं। मदर सेक्शन में सौ साल पुराने वृक्ष हैं जिनसे लगभग 1 लाख saplings तैयार की जाती है। बताया गया की तैयार की गई saplings का 90 प्रतिशत भाग राज्य के बाहर के बागवान और नर्सरी वाले ले जाते हैं। सिर्फ दस प्रतिशत ही बिहार के बागवान यहां से ले जाते हैं। इस प्रकार यह समझा जा सकता है की 90 हजार पौधे के दर से अगर प्रति वर्ष राज्य के बाहर के लोग ले जा रहे हैं तो इस फल की अहमियत कितनी है। और अधिक आश्चर्यजनक तथ्य जो प्राप्त हुआ वो यह की उस नब्बे प्रतिशत में बहुत सारा अंश जम्मू कश्मीर का है और गोहाटी का भी। गोहाटी के एक बागवान का मन तो लीची में ऐसा रमा की उन्होंने यहां पर दस दिनों का प्रशिक्षण प्राप्त किया और उसके बाद यहां से ले गए पौधे को अपने गोहाटी अवस्थित नर्सरी में मदर प्लांट की तरह स्थापित कर दिया है जहां से नॉर्थ ईस्ट के अन्य बागवानों के बीच वे भेजते रहते हैं। एक आम बिहारी होने के नाते मेरी समझ थी की लीची बाहर के प्रदेशों की जलवायु के लिए सेव की तरह ही उपयुक्त नहीं होगी मगर लगातार हो रहे रिसर्च से संस्थान के वैज्ञानिकों के द्वारा इतने तरह के प्रभेद पैदा कर दिए गए हैं की अब इसे कहीं भी लगाया जा सकता है। 
    प्रभेद की बात करें तो शाही सबसे उम्दा प्रभेद है और आदिम मानव की तरह मनु की भूमिका में आता है। श्रद्धा के तौर पर चाइना प्रभेद को माना जाना चाहिए जिसके पत्ते चिकने होते हैं और फल चीनी जैसी होती है। दोनों के पौधों को एक ही नर्सरी में एक दूसरे के बाएं और दाएं रखे देखकर मनु और श्रद्धा की कथानक याद आ जायेगी। इसी तरह गंडकी संपदा और गंडकी योगिता की भी जोड़ी प्रभेद है। इन सब के बीच क्रॉस से कई और प्रभेद प्रजनित किए गए हैं। एक वैरायटी लगान भी है जो सबसे लेट वैरायटी है, इसके मंजर जून में आते हैं जो अगस्त में फलित होता है। इसके पत्ते बड़े खुरदरा दिख रहे थे। और भी प्रभेद देखने को मिले जैसे की लालिमा (इसके नए पत्ते लालिमा से भरे होते हैं), बेदाना (छोटा पत्ता और छोटा बीजवाला फल देता है), मंदारजी, रोज सेंटेड, आदि आदि। आज से पहले शाही और चाइना छोड़कर किसी और प्रभेद की कोई जानकारी हमे नहीं थी। आप के सामने प्रश्न यह खड़ा होगा की किस वैरायटी के क्या गुण हैं ताकि यह डिसाइड किया जा सके की लगाया क्या जाय। तो बताना चाहेंगे की उत्पादन के दृष्टिकोण से शाही, चाइना और बेदाना का दबदबा बना हुआ है जो एक पेड़ से लगभग 80 से 100 किलो फल देते हैं। सबसे कम उत्पादन वाले प्रभेद गंडकी योगिता है जो 50 से 60 किलो तक फल देती है। गंडकी योगिता 70 से 80 किलो तक फल देती है। शेष सभी की क्षमता 80 किलो से ऊपर है। एक एक फल की साइज देखेंगे तो गंडकी संपदा की बाजी मार लेता है क्योंकि उसके एक फल 35 से 40 ग्राम के होते हैं वहीं इसका जोड़ीदार गंडकी योगिता का एक फल मात्र 17 से 18 ग्राम ही होता है जो सबसे हल्का फल वाला प्रभेद है। शाही का वजन 20 से 25 ग्राम है और चाइना का 22 से 27 ग्राम। बेदाना का एक फल 18 से 20 ग्राम है, मंदारजी के 24 से 25 ग्राम, रोज सेंटेड के 20 से 25 ग्राम। अधिकतर प्रभेद के फल का रंग गहरा लाल ही होता है जैसे शाही, चाइना, रोज सेंटेड, गंडकी संपदा मगर गंडकी योगिता का रंग हल्का लाल और बेदाना का माध्यम लाल होता है। हल्का और मध्यम का अंतर मेरी पकड़ से बाहर था। 
    नर्सरी में एक साल वाले और दो साल वाले पौधे दोनो तरह के रखे हुए थे। दोनो के रेट भी उसी प्रकार से रखे गए हैं जो की वहीं के काउंटर पर मिल जाते हैं। एक साल वाले पौधे की कीमत 100 रुपैया है और दो साल वाले पौधे की कीमत 200 रुपैया पर पौधा है।
    अंतर इतना ही नहीं है। बाग के सह संचालक और उत्तर प्रदेश के वासी श्री नरेंद्र दत्त जी के द्वारा बारीकी से शाही और लांगन पेड़ के तने को दिखाया गया जिससे अंतर स्पष्ट हो सके। शाही का तना बिलकुल चिकना तो लांगण का खुरदरा था। सबसे बड़ा अंतर तो पत्तों में था। जहां शाही के पत्ते चारों ओर से मुड़कर नाव के आकार के हो जाते हैं वहीं चाइना के पत्ते सीधे और छोटे होते हैं और लांगन के पत्ते hard होते हैं जो मुड़ते जल्दी नहीं हैं। लांगन लेट वैरायटी होने से जून में मंजराता है जबकि जनवरी में बाकी प्रभेद के मंजर दिख रहे थे। हमने सभी प्रभेद के पत्तों को तोड़कर मिलाने का प्रयास भी किया। बगान में रहनेवाले के लिए तो ये अंतर करना बहुत ही आसान था। कौन खोया है और कौन मलाई वे आराम से बता सकते हैं। प्रकृति ने हर अंतर उनके माथे पर लिख छोड़ा है बस पढ़नेवाला चाहिए। शाही को GI टैग मिलना उसे अन्य प्रभेदों से स्पेशल बना देता है। 
   बाग के हर कोने में कोई न कोई प्रयोग चल रहा है। एक कोने में तो कड़कनाथ, शिप्रा और मंदराजी तीन वैरायटी के मुर्गे को एक लीची के बगान में रखे गए हैं जो बगान चारों ओर से लोहे के तार से घेर दी गई है। कड़कनाथ मुर्गे को खुली जगह मिल जाती है और सभी मुर्गे मिलकर लीची के पौधों को नुकसान करनेवाले जीवों को खाकर पेड़ की रक्षा करते हैं। मुर्गे के बीट से पेड़ों को नेचुरल कंपोस्ट प्राप्त हो जाता है। यह प्रयोग स्तर पर है अभी। एक कोने में integrated farming का बेजोड़ नमूना देखने को मिला। वहां एक एकड़ और एक हेक्टेयर वाले दो मॉडल देखने को मिले। इस मॉडल के तहत बीच में तलाब और तलब के चौड़े भिंड पर केला, लीची और पपीता बोया गया है । तालाब के एक और के भिंड पर गाय और बकरियां पाली गई हैं। गाय और सूखे पत्तों को मिलाकर वहीं bio compost भी तैयार की जा रही है। एक और मॉडल देखने को मिला और वह था की लीची के पेड़ों के बीच डिस्टेंस बढ़ा दी गई और बीच में मचान बनाकर सेम का पौधा लत्तर वाला लगा दिया गया है। सब्जी का सब्जी और लीची का लीची। किसी किसी लीची के बगान में हल्दी लगाया गया है और कहीं केले की खेती की गई है। केले के सूखे पौधों से कंपोस्ट बना दिया जा रहा है। इस तरह के न जाने कितने प्राकृतिक प्रयोगशालाएं यहां देखने को मिलीं। ICAR भारत की एक अपूर्व वैज्ञानिक संस्था है और इस बाग को देखने से इसके अद्वितीय अंदाज को नकारा नहीं जा सकता। लीची की वर्तमान परिवार के सदस्यों सहित उनके 100 वर्षीय पूर्वजों से भी मुलाकात हो गई जो आज यहां की आबोहवा में अभी भी उतने ही जीवंत दिखते हैं। लीची के इस मीठे जंगल में आकर मन तक मीठा मीठा हो चला। लीची को सुखाकर और उसे certain temperature पर रखकर उसका किशमिश भी तैयार की जा रही है। बताया गया की उसकी पहली खेप दिल्ली के पूसा कृषि विश्वविद्यालय में लगे प्रदर्शनी में इसे लॉन्च किया जा रहा है। लीची के और भी कई उत्पाद को यहां तैयार करने में वैज्ञानिक लगे हुए हैं जो आनेवाले समय में लीची युग का सूत्रपात कर सकेगा। मुजफ्फरपुर में ही केडिया समूह का दुनिया में सबसे बड़ा लीची का उद्योग स्थापित है। सुशील कुमार सिंह तथा वैशाली के राजेश कुमार द्वारा भी बड़े उद्योग की स्थापना की घोषणा और इसके निर्यात में भाग लेने का बीड़ा उठाया गया है। आप खुश होंगे की भारत सरकार के सहयोग से इस बार लीची को इंग्लैंड की धरती पर उतारा गया और वहां के मार्केट तक APEDA के सहयोग से पहुंचाया गया। लीची के pulp का निर्यात में श्री आर के केडिया का योगदान अमूल्य और अद्वितीय रहा है। 
   इतने बड़े बाग को देखने के लिए समय और स्टैमिना दोनो चाहिए। अगर जब आप देखेंगे तो खुश हुए बिना नहीं रह सकेंगे। वादा है की जून के अंतिम सप्ताह तक लीची को चखने एक बार जरूर आऊंगा। बिलकुल ऑर्गेनिक लीची। जिस लीची के स्वाद को लेने की ललक दूर दूर तक के लोगों में रहती है आज उसके ननिहाल का दर्शन कर अपूर्व आनद की अनुभूति हुई। उम्मीद करता हूं की बिहार के किसान भी यहां आकर लीची के बेस्ट पौधों को अपने बगान में लगाएंगे ताकि आनेवाले समय में इसकी अहमियत बची रहे। आम और लीची राज्य की पहचान है जैसे सेब हिमाचल और कश्मीर के लिए। इस पहचान को बनाए रखना हमारा कर्तव्य है। आप और हम मिलकर इस कर्तव्य को निभाने की कसम के साथ आज की यात्रा यहीं समाप्त करता हूं। 
जय हिन्द जय बिहार
    शैलेंद्र


    

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